प्रतापगढ़ से क्या सबक लेंगे हम
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में कृपालु महाराज के भंडारे में शामिल होने के लिए आये हजारों श्रध्दालुओं के प्रवेश को लेकर हुए भगदड़ में 65 लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे एवं ढ़ाई सौ से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। यह हादसा जहां सैकड़ों परिवारों के लिए दुखदर्द साबित हुई है वहीं हमारी व्यवस्था और सुरक्षा तंत्र पर एक सवाल भी खड़ी करती है। हमने शायद लखनऊ की मायावती की रैली या फिर लालजी टंडन के साड़ी बांटने के कार्यक्रम से कोई सबक नहीं लिया है। इसके पहले लखनऊ रेलवे स्टेशन पर मायावती की रैली में भाग लेने गये लोगों के बीच मची भगदड़ में एक दर्जन लोगों ने जान गंवा दी थी। राजस्थान में मंदिर में दर्शन के लिए उमड़े श्रध्दालुओं के बीच ऐसा ही हादसा हुआ था। हमारी आदत है भूल जाने की इसीलिए शायद हम हादसों को भूल जाते हैं जब तक कि नये हादसे न हों। जहां हजारों की भीड़ हो , ऐसे में इस तरह के हादसों के होने की संभावना बनी रहती है बावजूद हमारी कोई तैयारी न होना गंभीर लापरवाही को बया करती है। कृपालु महाराज के आश्रम में भी कुछ इसी तरह की लापरवाही देखने में आयी है। ऐसे हादसों को रोकने के लिए न तो प्रशासन की ओर से ही कोई गंभीर प्रयास अब तक किये गये हैं और न ही ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने वाले बाबाओं की ओर से ही। बेशक इन हादसों को रोका जा सकता है , इसकी तैयारी पहले से हो तो।
कृपालु महाराज के आश्रम में जो हुआ वह मंदिर प्रशासन एवं व्यवस्था के भयंकर लापरवाही का नतीजा है लेकिन इसको भोगा गरीब जनता जो पच्चीस पचास रुपये की थाली और लोटा के लिए उस खूनी गेट पर खड़ी हुई थी। इसी के साथ एक बात समझ में नहीं आ रही है कि आज जब समाज में धर्म के बंधन ढीले पड़ते जा रहे हैं ऐसे में बाबाओं द्वारा हाईटेक संसाधनों से लैस लाखों की भीड़ में अचानक सत्संग करने की जरूरत क्यों आ पड़ी। अगर उन्हें इस तरह के कार्यक्रम आयोजित ही करने हैं तो इस तरह के हादसे न हों इसके लिए उनके पास उपाय क्या हैं। सरकारों के पास वैसे ही पुलिस कम हैं ऊपर से शहर में और देहातों में लगातार अपराधों में वृध्दि हो रही है इस स्थित में यदि प्रशासन पुलिस यहां लगाती है तो शहर की सुरक्षा कौन करेगा। क्या धर्म की दुकान चलाने वाले बाबाओं , महाराजों ने इस तरफ भी ध्यान दिया है।
प्रतापगढ़ का हादसा ठीक उसी तरह का है , जैसे कुछ साल पहले लखनऊ में भाजपा नेता लालजी टंडन के जन्मदिन के अवसर पर बांटी जाने वाली साड़ियों के समय हुआ था। यह हादसा महज एक हादसा नहीं है जिसे भुला दिया जाए बल्कि यह हादसा हमारे नेताओं के लिए , हमारे नीति निर्धारकों के लिए चुनौती है जो देश को आर्थिक प्रगति की दौड़ में ले जाने के लिए गांवों की उपेक्षा में जुटे हुए हैं। यह बिडंबना ही है कि हमारी सरकार देश की आर्थिक प्रगति की गति को अगले साल दस फीसदी करने के लिए पेट्रोल और डीजल के दामों में कटौती करने को तैयार नहीं है लेकिन थोड़ी सी लालच में मरती हुई जनता की तरफ उसका ध्यान नहीं है। प्रतापगढ़ में मारे गये लोग किसी प्राकृतिक आपदा या आतंकवादी हमले में नहीं मारे गये बल्कि इन लोगों ने लोटे , थाली और कंबल को पाने के लिए जान दिया। यदि यही खैरात मुंबई और दिल्ली में बंटता तो कोई लेने जाता। शायद नहीं क्योंकि यहां आर्थिक रूप से लोग ज्यादा संपन्न हैं। जरूरत गांवों की ओर ध्यान देने की है। गांवों में विकास की योजना लागू करने की है। जब तक गांवों और शहरों के बीच विकास के स्तर पर एक बड़ा गैप बना रहेगा तब तक ऐसे हादसों को रोक पाना संभव नहीं है। एक तरफ फोर्ब्स जैसी पत्रिकाओं में देश के कुछ लोगों के नाम विश्व के बड़े धन्नासेठों के रूप में छपने पर खुशी होती है। पढ़कर लगता है कि सचमुच देश आज अमेरिका जैसे देश को चुनौती देने में समक्ष हो गया है लेकिन जब इस तरह के हादसे सुनने में आता है तो उत्साह ठंडा पड़ा जाता है और लगता है कि यह आर्थिक विकास केवल आंकड़ों एवं कागजों पर है जमीन पर नहीं। जरूरत है हमें इस तरह के हादसे से लोगों को बचाने की क्योकि ये महज हादसे नहीं हैं बल्कि इन हादसों के पीछे के कारणों पर दुनिया भी नजर भी रखती है। अच्छा होता इसे हमारी सरकार भी समझती।
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