साड़ी को चाहिए नई जिंदगी
एक जमाना था , जब साड़ी पहनने वाली महिलाओं और युवतियों की संख्या बहुतायत में थी। हर जगह साड़ी पहने महिलाएं नजर आ जाती थीं। लेकिन अब ऐसी महिलाओं की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियां और युवतियां या तो स्कर्ट पहनना पसंद करती हैं या फिर सलवार कमीज। कुछ क्षेत्र विशेष में रहने वाली कामकाजी महिलाएं पारंपरिक रूप से गरारा पहनती हैं।
आधुनिक महिलाएं और फिल्मी तारिकाएं यूरोपीय शैली की लंबी ड्रेस पहनती हैं। इस ड्रेस की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इसके माध्यम से वे अपनी शारीरिक बनावट की सुंदरता को प्रदर्शित कर सकती हैं। ऐसे में साड़ी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है , बल्कि कहा जा सकता है कि वह धीमी मौत की ओर अग्रसर हो रही है। लेकिन इसमें केवल साड़ी ही खत्म नहीं हो रही है , इसका असर साड़ी बनाने वालों पर भी पड़ रहा है। आजकल साड़ी मिलों में या हैंडलूम पर बनाई जाती है। इसलिए अंदाजा लगाया जा सकता है कि यदि साड़ी का प्रचलन कम होता है तो हैंडलूम पर काम करने वालों की स्थिति क्या होगी। सच तो यह है कि आज हैंडलूम बुनकर बहुत ही कठिन हालात में जी रहे हैं।
दो साल पहले योजना आयोग ने बुनकरों के कल्याण के लिए कुछ करने का फैसला किया था। तब योजना आयोग की सदस्य सैयदा हमीद एक बहुत ही अद्भुत योजना के साथ सामने आई थीं। उन्होंने सोचा कि बुनकरों के कल्याण के लिए क्यों न कुछ प्रसिद्ध हस्तियों की मदद ली जाए। तब उन्होंने शाहरुख खान , सेफ अली खान और कुछ अन्य फिल्मी हस्तियों की सहायता ली , लेकिन कुछ विशेष फायदा नहीं हुआ।शर्मिला टैगोर के साथ सैयदा हमीद के काफी अच्छे रिश्ते रहे हैं। सैयदा ने इन्हीं अच्छे संबंधों का लाभ उठाते हुए आमिर खान से संपर्क किया। उस समय आमिर खान अपनी फिल्म ‘ तारे जमीन पर ' की शूटिंग में व्यस्त थे , लेकिन उन्होंने सैयदा से वायदा किया कि शूटिंग खत्म होने के बाद उन्हें जब भी समय मिलेगा , वे उनसे जरूर संपर्क करेंगे। अंतत: दो माह पहले आमिर खान ने सैयदा से मुलाकात की। इस मुलाकात में सैयदा ने उन्हें हथकरघा बुनकरों की खराब स्थिति के बारे में जानकारी दी। पिछले महीने आमिर खान और करीना कपूर सभी अखबारों और टीवी चैनलों पर मध्यप्रदेश के एक गांव में हथकरघे पर बुनाई करते हुए नजर आए। उन्होंने वह कपड़ा बनाया जिससे थ्री-पीस सूट और साड़ी बनती है। बाद में ‘3 इडियट्स ' के प्रीमियर में भी उन्होंने इसी कपड़े से बने वस्त्र पहने। देश का ध्यान गरीबी से त्रस्त बुनकरों की ओर खींचने के लिए उन्होंने अपने हिस्से की पूरी कोशिश की। आप शायद विश्वास भी नहीं करेंगे कि एक साड़ी को बुनने में एक बुनकर को हजार रुपए से ज्यादा नहीं मिल पाते हैं , जबकि उसे बनाने में करीब ९क् दिन लग जाते हैं। यही साड़ी बाद में ९ हजार से २५ हजार रुपए तक में बिकती है। आखिर ऐसे लोग जिएं तो जिएं कैसे ?
ऐसे कुछ लोग और भी हैं जो बुनकरों की दशा सुधारने के कार्य में लगे हुए हैं। ऐसी ही एक शख्सियत हैं शैली होल्कर जो माहेश्वरी साड़ियों को बाजार में टिकाए रखने के लिए अपनी ओर से प्रयास कर रही हैं। इसी तरह तारामती कुलकर्णी भी हैं जो वर्ली साड़ियों की प्रदर्शनियां आयोजित करती हैं। यदि हम जल्दी ही कुछ नहीं करते हैं तो हमारी विश्व प्रसिद्ध बनारसी और कांजीवरम साड़ियां अतीत का गौरव बनकर रह जाएंगी।
भगवान में आस्था
मुझे एक रिटायर्ड कर्नल का पत्र मिला। यह हाथ से लिखा हुआ चार पेज का पत्र था। ये कर्नल साहब सत्य साईं बाबा की नगरी पुत्तपर्ती मंे स्थायी रूप से बस गए हैं। उन्होंने लिखा कि हाल ही में वे केरल की यात्रा पर गए थे। वहां उनकी मुलाकात मेरे माता-पिता से हुई , जो जंगलों के मनोरम दृश्यों का आनंद उठा रहे थे। मेरे माता-पिता का आज से दो दशक पहले ही निधन हो चुका है। मेरे माता-पिता ने उन कर्नल साहब से कहा कि वे किसी भी धर्म में मेरी आस्था नहीं होने से बहुत परेशान हैं और यदि कर्नल मुझे सही राह पर ले आते हैं तो उनके प्रति बहुत आभारी रहेंगे। इसलिए उनके धार्मिक पुराण की शुरुआत इसी बात से हुई कि यदि मैं वाकई में इच्छा करूं तो सत्य साईं बाबा मेरे माता-पिता से मेरी मुलाकात करवा सकते हैं.
मैं सत्य साईं बाबा में उस बंदे की घनघोर आस्था को देखकर दंग रह गया , जिसका मानना था कि सत्य साईं बाबा भगवान के ही जीवित अवतार हैं। मैं उन रिटायर्ड कर्नल साहब की बात को सीधे खारिज कर सकता था , लेकिन मैं जानता हूं कि ऐसे कई और भी लोग हैं (जिनका मैं बेहद सम्मान करता हूं) जो ऐसे ही विचार रखते हैं। इनमें संवैधानिक मामलों के देश के जाने-माने वकील नानी पालकीवाला , भारत के सेवानिवृत्त प्रधान न्यायाधीश जस्टिस भगवती , सेवानिवृत्त वायुसेना प्रमुख और राजस्थान के पूर्व राज्यपाल ओपी मेहरा भी शामिल हैं , जिनसे मैं अक्सर मिलता रहता हूं।
मैं पक्का तर्कवादी हूं और मृतकों के साथ वार्तालाप व ऐसे ही चमत्कारों को मैं व्यर्थ की बातें मानता हूं। हालांकि इसके बावजूद मैं मेरे भविष्य को लेकर कर्नल की चिंता से अभिभूत था। इसलिए मैंने उस भावना के प्रति आभार व्यक्त किया , जो उन्होंने मुझे चिट्ठी लिखकर जताई थी। क्या उन्हें जवाब देने का कोई और तरीका हो सकता था ?
खून का कॉकटेल
उस रात मैं सो नहीं पा रहा था। उस कमरे में काफी ज्यादा मच्छर थे , जो मेरा सोना हराम किए हुए थे। वे मच्छर लगातार मेरे आसपास मंडराकर मुझे परेशान कर रहे थे। हालांकि मेरे बाजू में मेरी पत्नी आराम से खर्राटे लेकर सो रही थी। जब मैंने देखा कि मच्छर मेरा खून चूसना बंद ही नहीं कर रहे हैं तो मैं उठ गया।
लाइट चालू की और बिस्तर पर बैठ गया। एक मच्छर मेरा बहुत सारा खून पीकर काफी फूल चुका था। मैंने उसे पकड़कर पूछा , ‘ अरे कमबख्त मच्छर , तू मेरा ही खून क्यों पी रहा है , मेरी पत्नी का क्यों नहीं ?'‘ क्योंकि मुझे ‘ ओ पॉजिटिव ' पसंद है और इस ब्रांड का खून पीने में बहुत मजा आता है। तुम्हारी पत्नी का खून ‘ बी निगेटिव ' है जिसमें मुझे मजा नहीं आता है। ' मच्छर ने कहा। ‘ लेकिन तुम्हें ‘ बी निगेटिव ' को भी आजमाना चाहिए। ' मैंने कहा। ‘ अरे नहीं , तुम तो जानते ही हो कि यदि शराब को मिलाकर पी जाए तो चलना कितना मुश्किल हो जाता है। ' ( सौजन्य : आरएस माथुर , दिल्ली)
खुशवंत सिंह लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।
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