वाराणसी। महादेव की पावन नगरी काशी में कण-कण को शंकर माना जाता है, इसलिए यहाँ शिवलिंग का मिलना कोई बहुत आश्चर्यजनक बात नहीं है. लेकिन गंगा नद...
वाराणसी। महादेव की पावन नगरी काशी में कण-कण को शंकर माना जाता है, इसलिए यहाँ शिवलिंग का मिलना कोई बहुत आश्चर्यजनक बात नहीं है. लेकिन गंगा नदी की अगाध तलहटी से अचानक दो क्विंटल वजनी एक प्राचीन शिवलिंग का मिलना इन दिनों इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों (आर्कियोलॉजी एक्सपर्ट्स) के बीच गहरी चर्चा और शोध का विषय बना हुआ है।
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| Purvanchal Samachar |
यह विहंगम घटना रामनगर थाना क्षेत्र के सूजाबाद इलाके की है, जहां कुछ मल्लाहों को नदी में मछली पकड़ने के दौरान यह दिव्य शिवलिंग प्राप्त हुआ. काले चमकदार पत्थर से बने इस शिवलिंग के इतिहास, पौराणिकता और निर्माण शैली को लेकर अब कई तरह के दावे किए जा रहे हैं।
घटनाक्रम के अनुसार, दो दिनों पूर्व सूजाबाद के पास गंगा नदी में मल्लाहों ने मछली पकड़ने के लिए अपना जाल डाला था. जब जाल को बाहर खींचने का प्रयास किया गया, तो पानी के अंदर किसी बेहद भारी चीज के फंसे होने के कारण जाल टस से मस नहीं हुआ. इसके बाद करीब डेढ़ दर्जन मल्लाहों ने सूझबूझ दिखाई और जाल निकालने के लिए खुद गंगा की गहराई में उतरे. तलहटी में टटोलने पर उन्हें पत्थर का एक विशाल आकार महसूस हुआ, जिसे काफी मशक्कत के बाद जब पानी से बाहर निकाला गया, तो वहां मौजूद सभी लोगों की आंखें फटी की फटी रह गईं.
बाहर निकाला गया पत्थर गाढ़े काले और बेहद चमकदार रंग का एक अति सुंदर शिवलिंग था, जिसमें नीचे की तरफ अरघा भी पूरी तरह स्पष्ट और सुगठित बना हुआ था. इस शिवलिंग की सबसे अद्भुत विशेषता यह है कि इसके एक हिस्से पर साक्षात नाग देवता (सांप) की सुंदर आकृति बहुत ही बारीकी से उकेरी गई है. गंगा मैया की गोद से साक्षात महादेव के प्रकट होते ही पूरा घाट 'हर-हर महादेव' के गगनभेदी उद्घोष से गुंजायमान हो उठा. स्थानीय श्रद्धालुओं ने तुरंत इस पावन शिवलिंग को सूजाबाद घाट के पास ही एक ऊंचे चबूतरे पर सुरक्षित स्थापित कर दिया है, जहां अब भारी भीड़ के बीच इसकी विधिवत पूजा-पाठ और जलाभिषेक का सिलसिला शुरू हो गया है.
इस दुर्लभ शिवलिंग की प्राचीनता और ऐतिहासिकता को लेकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के पुरातत्व विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर अशोक कुमार सिंह ने शुरुआती विश्लेषण के आधार पर एक बड़ा अनुमान जताया है. प्रोफेसर सिंह के मुताबिक, शिवलिंग के वायरल वीडियो और उसकी विशिष्ट बनावट को देखकर यह प्रतीत होता है कि गाढ़े काले रंग का यह चमकदार शिवलिंग संभवतः 9वीं या 10वीं शताब्दी (प्रतिहार या पाल काल) का हो सकता है. शिवलिंग पर बनी सांप की आकृति इसकी प्राचीनता और तत्कालीन मूर्तिकला की शैली को प्रमाणित करती है. बहरहाल, पुरातत्व विभाग की टीम जल्द ही इस स्थल का निरीक्षण कर इसके वास्तविक इतिहास का पता लगाने की तैयारी में है।
