वाराणसी। मोक्षदायिनी गंगा की सहायक 'असि नदी' के अस्तित्व को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। एक...
वाराणसी। मोक्षदायिनी गंगा की सहायक 'असि नदी' के अस्तित्व को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने बेहद सख्त रुख अख्तियार किया है। एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान एनजीटी ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें असि नदी को 'नाला' के रूप में दर्शाया गया था।
![]() |
| Purvanchal Samachar |
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गंगा नदी प्राधिकरण आदेश 2016 के तहत असि नदी को पूर्ण संरक्षण प्राप्त है और इसे किसी भी कीमत पर टैप नहीं किया जा सकता।
"असि नदी है, नाला नहीं": एनजीटी चेयरपर्सन की तीखी टिप्पणी
एनजीटी के चेयरपर्सन न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल की खंडपीठ के सामने जब राज्य सरकार के अधिवक्ता ने शपथपत्र के जरिए असि नदी को 'नाला' बताया, तो कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई। न्यायमूर्ति श्रीवास्तव ने मौखिक टिप्पणी करते हुए सीधे सवाल किया— "आपने असि नदी को नाला कैसे मान लिया? इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक नदी है।"
असि को टैप करने का मतलब गंगा को रोकना
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने 'गंगा नदी (पुनरुद्धार, संरक्षण और प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश, 2016' का हवाला देते हुए कुछ बड़े बिंदु रखे:
- कानूनी संरक्षण: गंगा और उसकी सभी सहायक नदियां इस आदेश के तहत सुरक्षित हैं।
- टैपिंग पर रोक: कोर्ट ने कहा कि असि नदी को टैप करने का सीधा अर्थ गंगा नदी के प्रवाह को टैप करना है, जो कानूनन गलत है।
- अस्तित्व का सवाल: याची सौरभ तिवारी की दलील पर मुहर लगाते हुए एनजीटी ने माना कि नदी के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ करना पर्यावरण नियमों का उल्लंघन है।
क्यों अहम है यह फैसला?
वाराणसी में असि नदी पिछले लंबे समय से प्रदूषण और अतिक्रमण की मार झेल रही है। सरकारी फाइलों में इसे नाला मानकर ट्रीट किए जाने की कोशिशों पर एनजीटी की यह फटकार नदी के पुनरुद्धार के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी है। अब राज्य सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वह नदी के नैसर्गिक स्वरूप को बचाने के लिए क्या ठोस कदम उठा रही है।
काशी का नाम वाराणसी कैसे पड़ा, असि नदी का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व
वाराणसी का नाम 'वरुणा' और 'असि' इन दो नदियों के मिलन के कारण ही विश्वविख्यात हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, असि नदी का उद्गम स्वयं भगवान शिव के त्रिशूल के प्रहार से हुआ माना जाता है। स्कंद पुराण के काशी खंड में भी असि नदी की महिमा का विस्तार से वर्णन है। धार्मिक दृष्टिकोण से, असि और गंगा का संगम 'असि संगम तीर्थ' कहलाता है, जहाँ स्नान का विशेष महत्व है। इतिहासकार बताते हैं कि कभी यह नदी काशी की दक्षिणी सीमा को परिभाषित करती थी, जिसे आज सरकारी उपेक्षा के कारण 'नाला' कहने की कोशिश की जा रही है। एनजीटी की ताज़ा टिप्पणी ने इसी ऐतिहासिक गौरव को दोबारा कानूनी सुरक्षा प्रदान की है।
