वाराणसी। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी अब काल-गणना के क्षेत्र में भी दुनिया को प्राचीन भारत की वैज्ञानिक ताकत का अहसास कराएगी। श्रीकाशी विश्...
वाराणसी। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी अब काल-गणना के क्षेत्र में भी दुनिया को प्राचीन भारत की वैज्ञानिक ताकत का अहसास कराएगी। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के चौक क्षेत्र में देश की दूसरी 'विक्रमादित्य वैदिक घड़ी' का भव्य शुभारंभ किया गया। उज्जैन के बाद वाराणसी वह दूसरा सौभाग्यशाली केंद्र बना है, जहां सम्राट विक्रमादित्य की गौरवगाथा को समेटे यह अनूठी घड़ी स्थापित की गई है। मध्य प्रदेश सरकार की ओर से भेंट की गई यह घड़ी न केवल समय बताएगी, बल्कि दो ज्योतिर्लिंगों—अवंतिका और काशी—के सांस्कृतिक मिलन की गवाह भी बनेगी।
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| Purvanchal Samachar |
700 किलो की घड़ी और 30 मुहूर्तों का विज्ञान
लखनऊ की संस्था 'आरोहण' द्वारा तैयार की गई 700 किलोग्राम वजनी इस घड़ी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में बाबा के चरणों में अर्पित किया गया। यह घड़ी पश्चिमी GMT (ग्रीनविच मीन टाइम) की 24 घंटे की अवधारणा से इतर, भारतीय पद्धति के अनुसार 24 घंटों को 30 'मुहूर्त' (घटी) में विभाजित करती है। खास बात यह है कि यह पूरी तरह सूर्योदय और सूर्यास्त पर आधारित है। इसमें पल-प्रतिपल की सूक्ष्म गणना के साथ-साथ पंचांग, ग्रहों की स्थिति और शुभ-अशुभ मुहूर्त की सटीक जानकारी मिलेगी।
उज्जैन 'समय' की नगरी तो काशी 'पंचांग' का केंद्र: योगी
लोकार्पण के अवसर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जहां उज्जैन 'काल गणना' की नगरी है, वहीं काशी 'पंचांग' का मुख्य केंद्र रही है। इन दोनों का संगम भारत की प्राचीन वैज्ञानिक विरासत को वैश्विक पटल पर फिर से स्थापित करेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह घड़ी हमारी युवा पीढ़ी को बताएगी कि जब दुनिया समय देखना भी नहीं जानती थी, तब हमारे पूर्वज नक्षत्रों और ग्रहों के परिभ्रमण की सटीक गणना कर रहे थे।
(विशेष टिप्पणी):
काशी विश्वनाथ धाम में वैदिक घड़ी का लगना केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि पश्चिमी मानसिक गुलामी से मुक्ति का एक और शंखनाद है। हम अब तक लंदन के एक छोटे से गांव 'ग्रीनविच' के आधार पर अपना समय तय करते आए हैं, जबकि भारत का समय विज्ञान उससे कहीं अधिक सूक्ष्म और तर्कसंगत है। यह घड़ी न केवल श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनेगी, बल्कि ज्योतिष और खगोल विज्ञान के छात्रों के लिए एक जीवंत प्रयोगशाला भी साबित होगी। काशी का 'पंचांग' और उज्जैन का 'काल' मिलकर अब विश्व को नई दिशा देंगे।
